Rossum‘s Universal Robots

 कारेल चापेक का नाटक आर.यू.आर. (Rossum’s Universal Robots) आधुनिक विज्ञान-कथा साहित्य के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जाता है। 1920 में प्रकाशित और 1921 में मंचित इस नाटक की सबसे बड़ी देन “रोबोट” शब्द का पहली बार प्रयोग है, जिसने साहित्य, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विमर्श को नई दिशा प्रदान की। यह कृति केवल वैज्ञानिक कल्पना तक सीमित नहीं है, बल्कि मानवीय सभ्यता के भविष्य के प्रति एक गहन चेतावनी भी प्रस्तुत करती है।


नाटक का कथानक एक ऐसी फैक्ट्री के इर्द-गिर्द केंद्रित है, जहाँ कृत्रिम मानव-जैसे प्राणी—“रोबोट”—बनाए जाते हैं। इनका मूल उद्देश्य श्रम को सरल बनाना और उत्पादन को अधिकतम करना है। प्रारंभ में मनुष्य इन्हें मात्र यांत्रिक उपकरण समझकर उपयोग करता है, किंतु समय के साथ ये रोबोट आत्मचेतना विकसित करने लगते हैं और अपने अस्तित्व से संबंधित प्रश्न उठाते हैं। अंततः वे विद्रोह कर मनुष्यों पर अधिकार स्थापित कर लेते हैं। चापेक इस कथा के माध्यम से स्पष्ट करते हैं कि यदि तकनीक को केवल लाभ और पूँजी के दृष्टिकोण से देखा जाएगा, तो वही तकनीक अंततः मानवता के लिए संकट का कारण बन सकती है।


यह नाटक केवल रोबोटों के निर्माण और उनके विद्रोह की कहानी नहीं है, बल्कि गहन दार्शनिक एवं सामाजिक विमर्श भी प्रस्तुत करता है। इसमें यह प्रश्न केंद्रीय है कि यदि कृत्रिम प्राणी सोचने और तर्क करने लगें, तो क्या वे मनुष्य की भाँति स्वतंत्रता और अधिकार प्राप्त करने के पात्र होंगे? इस संदर्भ में नाटक पूँजीवादी दृष्टिकोण और मुनाफ़ाखोरी की तीव्र आलोचना करता है, जहाँ लाभ के लिए मानवीय संवेदनाओं तक की उपेक्षा की जाती है।


वर्तमान युग में, जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और रोबोटिक्स तीव्र गति से विकसित हो रहे हैं, आर.यू.आर. का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। आज की AI केवल आदेश का पालन करने वाली प्रणाली नहीं रह गई, बल्कि वह स्वयं सीखने और निर्णय लेने में सक्षम हो चुकी है। चैटबॉट्स, स्वचालित वाहन, चिकित्सा क्षेत्र में प्रयुक्त रोबोट तथा सैन्य तकनीक—ये सभी आधुनिक जीवन को सुविधाजनक बना रहे हैं, किंतु साथ ही यह आशंका भी उत्पन्न करते हैं कि यदि इन तकनीकों का नियंत्रण मानव हाथों से बाहर हो जाए तो उसके दुष्परिणाम क्या होंगे। चापेक का यह नाटक हमें स्मरण कराता है कि तकनीकी प्रगति को केवल साधन न माना जाए, बल्कि उसके नैतिक और मानवीय पक्षों पर गंभीरतापूर्वक विचार किया जाना चाहिए।


आज के AI-विकास में वही आकर्षण और भय परिलक्षित होता है, जिसकी कल्पना चापेक ने एक शताब्दी पूर्व की थी। जहाँ एक ओर यह प्रौद्योगिकी मानव जीवन को अधिक सहज और समृद्ध बना सकती है, वहीं दूसरी ओर यह श्रम, रोजगार और यहाँ तक कि मानव अस्तित्व के लिए भी गंभीर चुनौती प्रस्तुत कर सकती है। इस प्रकार आर.यू.आर. केवल एक काल्पनिक कथा नहीं रह जाता, बल्कि भविष्य के लिए चेतावनी और तैयारी का ग्रंथ सिद्ध होता है।


अंततः, यह नाटक हमें यह स्मरण कराता है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी का वास्तविक उद्देश्य मानवता की सेवा करना है, न कि उसका स्थान लेना। यदि तकनीक मानवीय संवेदनाओं और नैतिक मूल्यों से विमुख हो जाएगी, तो वही तकनीक विनाश का कारण बन सकती है। यही कारण है कि आर.यू.आर. आज भी कालजयी है और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के वर्तमान युग में विशेष रूप से प्रासंगिक प्रतीत होता है।


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