പോസ്റ്റുകള്‍

अपने हिस्से में लोग आकाश देखते हैं- विनोद कुमार शुक्ल

 अपने हिस्से में लोग आकाश देखते हैं- विनोद कुमार शुक्ल विनोद कुमार शुक्ला की यह कविता व्यक्तिगत अनुभव और सार्वभौमिक सत्य के अंतर्संबंधों को अत्यंत सूक्ष्मता से रेखांकित करती है। कवि यह प्रतिपादित करते हैं कि यद्यपि प्रकृति और उसके तत्व जैसे आकाश, चंद्रमा और हवा सभी के लिए समान रूप से उपलब्ध हैं, परंतु उनका बोध और अर्थ प्रत्येक व्यक्ति की विशिष्ट सामाजिक-आर्थिक स्थिति के आधार पर भिन्न होता है। “सबके हिस्से का आकाश पूरा आकाश है” जैसी पंक्तियाँ यह संकेत देती हैं कि हर व्यक्ति अपनी सीमित दृष्टि और परिस्थितियों के भीतर ही संपूर्ण ब्रह्मांड को आत्मसात करने का प्रयास करता है। यहाँ आकाश केवल एक खगोलीय वस्तु नहीं, बल्कि जीवन की व्यापकता और उसकी उपलब्धताओं का प्रतीक बनकर उभरता है। कविता का वैचारिक विस्तार सामाजिक विषमता की उस कठोर वास्तविकता की ओर मुड़ता है, जहाँ संसाधनों की उपलब्धता के बावजूद उनके उपभोग का धरातल समान नहीं है। बगीचे में बैठकर अखबार पढ़ने वाले व्यक्ति और नारकीय परिस्थितियों में जीवन व्यतीत करने वाले व्यक्ति के बीच का अंतर यह स्पष्ट करता है कि भौतिक सत्य (जैसे समय या हवा) वस्त...

Chocolate -Novel _pandey bechan sharma

  अक्सर कहा जाता है कि प्रेम का कोई तट नहीं होता। वह सरहदों, दायरों और परिभाषाओं से परे बहता है। फिर भी, प्रेम मानव इतिहास में सबसे अधिक विवादों, बहसों और सामाजिक पहचानों का केंद्र रहा है। प्रेम केवल मन का एक सहज भाव नहीं, बल्कि समाज द्वारा रची गई असंख्य सीमाओं—जाति, वर्ग, लिंग और परंपराओं—के ताने-बाने से उलझा हुआ अनुभव है। औपनिवेशिक युग के आगमन ने इस उलझन को और गहरा कर दिया। विक्टोरियन नैतिकताओं और कठोर ब्रिटिश कानूनों ने भारतीय समाज में समान-लिंगी प्रेम को पाप, अपराध और लज्जा के आवरण में ढक दिया। धीरे-धीरे वह विविध, प्रवाहमान, स्वाभाविक यौन-संवेदनाएँ, जो पूर्व-औपनिवेशिक भारत में अनेक रूपों में खुलकर साँस लेती थीं, अंग्रेज़ी शासन के दवाब में ‘विकृति’ और ‘हीनता’ के रूप में आरोपित की जाने लगीं। इसी कड़ी में भारतीय पुरुषत्व भी पश्चिमी आदर्शों की कसौटी पर कसकर नया रूप लेने को विवश हुआ। इन परिवर्तनों की गूँज साहित्य में भी सुनाई दी, ख़ासकर उस समय जब स्वतंत्रता का सपना आकार ले रहा था। हिंदी साहित्य में समलैंगिकता पर विचार की बात हो और बचन शर्मा ‘उग्र’ का चाकलेट उसमें न आए—यह संभव नह...

इश्क में नदी -कविता संग्रह

“सतसईया के दोहरे, ज्यों नावक के तीर  देखन में छोटे लगे, घाव करत गंभीर” मतलब है जो आकार में छोटा है  वह गहरा घाव कर देता है। ठीक इसी प्रकार अमित कुमार जी  द्वारा लिखित ‘इश्क में नदी’ संग्रह में सम्मिलित कविताएं, सरलतम शब्दावली में , छोटे आकार में होने के बावजूद भी  अर्थ शक्ति और काव्य सुंदरता की दृष्टि में देखे तो अद्वितीय है। प्रस्तुत संग्रह में खुद कवि ने लिखा है- “ये कविताएँ छोटी है, लेकिन इनमें से अधिकतर बहुत प्रभावी है, जो जीवन को देखने का एक अलग नज़रिया देती है, जीवन के कई आयाम दिखाती है।“ उनकी कविताएं एकाँकी और कोमल हृदयों को छूती है। कविता संग्रह के अध्ययन करते वक्त मुझे लगा कि प्रत्येक कविता जिंदगी के विभिन्न पहलुओं को कागज़ में उतारने की विनम्र कोशिश है। शीर्षक को सार्थकता देते  हुए अमित जी की इस कविताओं के केंद्र में प्रेम है। मुख्य रूप से प्रेम के  दो पक्ष हैं  - संयोग पक्ष और वियोग पक्ष। वियोग दुखदायी जरूर है। पंत के अनुसार “वियोगी होगा पहला कवि / आह से उपजा होगा गान/” इसको सार्थक बनाते हुए उन्होंने  ‘तुम्हारे पत्र’ नामक कविता में ...

K. R. Meera’s Aa Maratheyum Marannu Marannu Njan

  K. R. Meera’s Aa Maratheyum Marannu Marannu Njan (I Too Forgot That Tree Again and Again) is a poignant exploration of the feminine self under patriarchy, narrated through the life of Radhika. The novella begins with an incident that sets the tone for the entire narrative: a ten-year-old girl is abandoned by her father on the roadside. What appears as a careless act, comparable to forgetting an umbrella or a pair of slippers, becomes a life-defining wound. The father’s indifference, his preference for alcohol and his mistress over his daughter, not only initiates Radhika’s personal tragedy but also symbolizes the patriarchal betrayal that women inherit as part of their condition. From the perspective of trauma studies, this primal wound is not limited to childhood; it reverberates across time, shaping Radhika’s identity well into adulthood. Even at thirty-six, she remains tethered to that moment of loss, unable to escape its shadow. Meera’s narrative insists on the persistence ...

ब्लैक ब्यूटी – अन्ना सिवेल

  ब्लैक ब्यूटी – अन्ना सिवेल ‘‘अपने नए निवास-स्थान में मैं बहुत संतुष्ट था। मुझे वहाँ सब कुछ मिल रहा था, सिवाय एक चीज़ के। मुझसे जुड़े सभी लोग अच्छे और स्नेही थे। यदि मैं आज़ाद होता तो हवा और रोशनी भरपूर मिलती; अच्छा भोजन और अच्छे मित्र भी थे। फिर मुझे और क्या चाहिए था? केवल एक ही चीज़: स्वतंत्रता। पिछले साढ़े तीन वर्षों तक मैं पूरी तरह स्वतंत्र था। जो चाहा वह कर सकता था, अपनी इच्छानुसार जी सकता था। लेकिन आज अब ऐसा संभव नहीं। हर सप्ताह, हर महीने, हर आने वाले वर्ष मुझे इस अस्तबल में आज्ञाकारी बने रहना है। ज़रूरत पड़ने पर सवारी पर जाना है, और तब भी हर कदम सावधानी से रखना है। शरीर पर पट्टे, आँखों पर ढकनेवाला पर्दा, और मुँह में लोहे की लगाम। मुझे कोई शिकायत नहीं, क्योंकि यह सब घोड़ों के जीवन का हिस्सा है। फिर भी, मेरे जैसे स्वस्थ, युवा और उत्साही घोड़े को कभी-कभी खुली हरी घास पर, ताज़ी हवा और उजाले में खुलकर जीने का अवसर मिलना चाहिए, क्या ऐसा नहीं होना चाहिए?’’ ब्लैक ब्यूटी के मनोभावों के माध्यम से ही यह उपन्यास आगे बढ़ता है। सुंदर खेत और घास के मैदान में अपनी माँ के साथ रहने वाला एक...

Rossum‘s Universal Robots

  कारेल चापेक का नाटक आर.यू.आर. (Rossum’s Universal Robots) आधुनिक विज्ञान-कथा साहित्य के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जाता है। 1920 में प्रकाशित और 1921 में मंचित इस नाटक की सबसे बड़ी देन “रोबोट” शब्द का पहली बार प्रयोग है, जिसने साहित्य, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विमर्श को नई दिशा प्रदान की। यह कृति केवल वैज्ञानिक कल्पना तक सीमित नहीं है, बल्कि मानवीय सभ्यता के भविष्य के प्रति एक गहन चेतावनी भी प्रस्तुत करती है। नाटक का कथानक एक ऐसी फैक्ट्री के इर्द-गिर्द केंद्रित है, जहाँ कृत्रिम मानव-जैसे प्राणी—“रोबोट”—बनाए जाते हैं। इनका मूल उद्देश्य श्रम को सरल बनाना और उत्पादन को अधिकतम करना है। प्रारंभ में मनुष्य इन्हें मात्र यांत्रिक उपकरण समझकर उपयोग करता है, किंतु समय के साथ ये रोबोट आत्मचेतना विकसित करने लगते हैं और अपने अस्तित्व से संबंधित प्रश्न उठाते हैं। अंततः वे विद्रोह कर मनुष्यों पर अधिकार स्थापित कर लेते हैं। चापेक इस कथा के माध्यम से स्पष्ट करते हैं कि यदि तकनीक को केवल लाभ और पूँजी के दृष्टिकोण से देखा जाएगा, तो वही तकनीक अंततः मानवता के लिए संकट का कारण बन स...

Satyaki: Dwapar Ka Ajey Yodha

  महाभारत भारतीय साहित्य और संस्कृति की वह महागाथा है जिसे शाश्वत कहा जाता है। इसमें धर्म, राजनीति, युद्ध और दर्शन का ऐसा मिश्रण है जो आज भी हमें विस्मित करता है। लेकिन जब हम इस महाकाव्य का स्मरण करते हैं तो सबसे पहले अर्जुन, भीम, दुर्योधन, भीष्म या कृष्ण जैसे पात्र ही सामने आते हैं। ऐसे में कई अन्य योद्धा और चरित्र पीछे छूट जाते हैं। सात्यकि ऐसा ही एक नाम है—कृष्ण का शिष्य, यदुवंशी योद्धा और कुरुक्षेत्र युद्ध का महत्त्वपूर्ण लेकिन प्रायः भुला दिया गया सेनानी। इसी अनदेखे नायक पर केंद्रित हाल का हिंदी उपन्यास  “ सात्यकि   द्वापर   का   अजेय   योद्धा ”  पाठकों को न केवल नया दृष्टिकोण देता है, बल्कि यह भी बताता है कि साहित्य कैसे हमारी ऐतिहासिक स्मृति को नया आकार दे सकता है। इस उपन्यास की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि लेखक ने सात्यकि को केवल युद्ध-भूमि का योद्धा बनाकर नहीं छोड़ा, बल्कि उसकी मानवीय संवेदनाओं और मानसिक संघर्षों को भी सामने रखा है। कृष्ण का शिष्य होना उसे गौरव तो देता है, लेकिन इसके साथ ही उस पर नैतिक दायित्व का बोझ भी है। युद्धभूमि में उसकी भू...