अपने हिस्से में लोग आकाश देखते हैं- विनोद कुमार शुक्ल
अपने हिस्से में लोग आकाश देखते हैं- विनोद कुमार शुक्ल विनोद कुमार शुक्ला की यह कविता व्यक्तिगत अनुभव और सार्वभौमिक सत्य के अंतर्संबंधों को अत्यंत सूक्ष्मता से रेखांकित करती है। कवि यह प्रतिपादित करते हैं कि यद्यपि प्रकृति और उसके तत्व जैसे आकाश, चंद्रमा और हवा सभी के लिए समान रूप से उपलब्ध हैं, परंतु उनका बोध और अर्थ प्रत्येक व्यक्ति की विशिष्ट सामाजिक-आर्थिक स्थिति के आधार पर भिन्न होता है। “सबके हिस्से का आकाश पूरा आकाश है” जैसी पंक्तियाँ यह संकेत देती हैं कि हर व्यक्ति अपनी सीमित दृष्टि और परिस्थितियों के भीतर ही संपूर्ण ब्रह्मांड को आत्मसात करने का प्रयास करता है। यहाँ आकाश केवल एक खगोलीय वस्तु नहीं, बल्कि जीवन की व्यापकता और उसकी उपलब्धताओं का प्रतीक बनकर उभरता है। कविता का वैचारिक विस्तार सामाजिक विषमता की उस कठोर वास्तविकता की ओर मुड़ता है, जहाँ संसाधनों की उपलब्धता के बावजूद उनके उपभोग का धरातल समान नहीं है। बगीचे में बैठकर अखबार पढ़ने वाले व्यक्ति और नारकीय परिस्थितियों में जीवन व्यतीत करने वाले व्यक्ति के बीच का अंतर यह स्पष्ट करता है कि भौतिक सत्य (जैसे समय या हवा) वस्त...