इश्क में नदी -कविता संग्रह

“सतसईया के दोहरे, ज्यों नावक के तीर 

देखन में छोटे लगे, घाव करत गंभीर”

मतलब है जो आकार में छोटा है  वह गहरा घाव कर देता है। ठीक इसी प्रकार अमित कुमार जी  द्वारा लिखित ‘इश्क में नदी’ संग्रह में सम्मिलित कविताएं, सरलतम शब्दावली में , छोटे आकार में होने के बावजूद भी  अर्थ शक्ति और काव्य सुंदरता की दृष्टि में देखे तो अद्वितीय है। प्रस्तुत संग्रह में खुद कवि ने लिखा है- “ये कविताएँ छोटी है, लेकिन इनमें से अधिकतर बहुत प्रभावी है, जो जीवन को देखने का एक अलग नज़रिया देती है, जीवन के कई आयाम दिखाती है।“ उनकी कविताएं एकाँकी और कोमल हृदयों को छूती है। कविता संग्रह के अध्ययन करते वक्त मुझे लगा कि प्रत्येक कविता जिंदगी के विभिन्न पहलुओं को कागज़ में उतारने की विनम्र कोशिश है। शीर्षक को सार्थकता देते  हुए अमित जी की इस कविताओं के केंद्र में प्रेम है। मुख्य रूप से प्रेम के  दो पक्ष हैं  - संयोग पक्ष और वियोग पक्ष। वियोग दुखदायी जरूर है। पंत के अनुसार “वियोगी होगा पहला कवि / आह से उपजा होगा गान/” इसको सार्थक बनाते हुए उन्होंने  ‘तुम्हारे पत्र’ नामक कविता में  ब्रेकअप ईस ए वेकअप कॉल को स्थापित किया। अतीत के प्यार जीने के लिए प्रेरणा होना चाहिए। 

 “तुझे एक लंबी सांस में भरते हुए 

   मैं फिर जी उठा।“

इस प्रकार अतीत के यादों को अभिव्यक्त करने के लिए अनुभव होना ज़रूरी है। प्रस्तुत वियोग से गुज़रते हुए ज़िंदगी को सफलता की मुकाम पर पहुँचने वाले व्यक्ति में ही ऐसे लिखने की ताकत होती  है। डिजिटल युग में जी रहे आधुनिक मनुष्य को सब कुछ बिकाऊ वस्तु है। ‘यूस एण्ड थ्रो’ जिंदगी का आदर्श बन चुका  है। परिणाम स्वरूप प्रेम भी सिर्फ एक वस्तु बनकर रह गया है। आजकल की पीढ़ी प्यार की शक्ति  से एकदम अपरिचित है। व्यस्तता भरी जिंदगी में न प्यार के लिए जगह बचा है , न रिश्ते के लिए। प्रेम की शक्ति से पाठकों को अवगत कराने के लिए, गाढ़े दिन में सहारा बनने की ताकत से युक्त प्रेम को ‘फूल न झरे’ नामक कविता में दिखाया गया है। ‘प्यार’ नामक  कविता के ज़रिए कवि ने हाईटेक समय में प्यार में आए बदलावों को पाठकों के सम्मुख रखा है। आजकल प्यार के मायने ही  एकदम बदल गए हैं। 

“सिस्टम हो   या /संस्थाएं /समाज हो या /वर्ग / स्वार्थ हो गया /पोससीवेनेस्स /उम्र हो या / आगे जाने की होड  /सभी दबाना चाहते हैं /मारना चाहते है /कुचलना चाहते हैं /प्यार को ---------कदाचित /इसलिए प्यार लुकता- छिपता है /समाज से /परिवार से /स्वयं अपने से भी।“ 

‘इश्क में नदी’ नामक कविता में प्रेम में स्त्री और पुरुष के  व्यवहार और   दोनों के प्रेम का  फर्क  दिखलाया है।

“वह /मेरे इश्क में /नदी बन के /मचलती रही /खिलती रही /लिपटती रही /बहती रही /मैं उसके इशक में /जरूरतों और जिम्मेदारियों के जंगल में /पहाड़ होकर /खडा रहा /पिसता रहा /मिटता रहा।“

प्रस्तुत कविता संग्रह में सिर्फ प्रेम को  ही नहीं दर्शाया है, बल्कि कवि ने अनेक सामाजिक विडंबनाओं के प्रति अपनी प्रतिक्रिया जाहिर की है। साथ – साथ प्रचलित कुछ तत्वों पर  अपनी ढंग से, परिभाषा भी दिया है। वह एकदम सराहनीय है। 

‘आजकल’ कविता में कवि एक उज्जवल भविष्य के दूरदर्शी के समान पाठकों के सामने आते हैं । हतप्रभ लोगों को उज्ज्वल भविष्य का सपना दिखाती है। प्रस्तुत कविता संघर्षों को डटकर सामना करने की प्रेरणा भी  देती है। 

“आजकल/ भूख/ गरीबों को नहीं सताती/ पानी/ प्यासों को नहीं सताती/आजकल भेदभाव/इंसान को/नहीं बाँटता/ सुना है / आजकल दुनिया बदल गई है”/

‘नहीं बता सकता’ कविता में भी मुसीबतों में न हारकर, जिंदगी को आगे की ओर ले जानेवाले मनुष्य  के संघर्षों को वाणी दिया है। 

“बता सकता हूँ/ बस इतना कि /जंग / जारी है/ समाज से/ हालात से/”

इस कविता की अंतर्विरोधी है ‘धीरे – धीरे’ शीर्षक कविता । इसमें जिंदगी के संघर्षों से हारकर संवेदनहीन होते जा रहे लोगों को दर्शाया है। मुझे लगता है कि यह अंतर्विरोध कवि मन के अंतरद्वन्द्व का परिणाम है , नहीं तो विशाल अनुभव संपन्नता का परिणाम है। 

“धीरे - धीरे / आँख की गर्मी मरती है/ विचारों की बेचैनी मरती है/ बाजुओं की ऐठन मरती है/ हौसला मरता है/ जुझारूपन मरता है/  लड़ने की ताकत मरती है/ जमीर मरता है/”

जिंदगी को स्वास्थ्य और खुशहाल बनाने के उपदेश ‘उसने’ नामक कविता के ज़रिए कवि ने दिया है। उनके अनुसार जीने के लिए दो तरीका है । इन दो तरीकों  को प्रस्तुत करते हुए कवि ने जटिल और संकीर्ण जिंदगी को सहूलियत बनाने के लिए उपदेश दिया है। प्रस्तुत कविता मेरे ख्याल से सरलीकरण का उत्तम सबूत भी है। 

“उसने मुट्ठी भर/ खुशियों को छिंट दिया/ बटोरते – बटोरते जिंदगी/ जी ली मैं ने/”

कविता कितनी छोटी है, फिर भी आशय बहुत प्रासंगिक और गहरा है। क्यों कि आजकल अपनी खुशियों को हासिल करने के लिए दूसरों की खुशियों को छीनकर खुश रहनेवालों की संख्या काफी अधिक है । ये  लोग यह भूल जाते है कि खुशियां बटोरने से ही दुगुना हो जाती है। जिंदगी के असली मकसद दिखाते हुए कवि ने परोक्ष रूप से कहा कि भौतिक सुख – सुविधाओं से ज़िंदगी पूर्ण नहीं है। 

“मंजिलें हैं/ रास्ते हैं/ संघर्ष है/ दिल है/ दिमाग है/ मन है / रिश्ते है / प्यार है / सुकून है ज़िंदगी !!!/ तुम / कहाँ हो?”

इस कविता संग्रह में कवि ने अपनी पर्यावरणीय चेतना भी व्यक्त किया है। हिन्दी साहित्य में पहले से ही  पर्यावरणीय  चेतना एवं  मानव जीवन को बराबर महत्व देते आए हैं । मानव का अस्तित्व पर्यावरण से जुडा हुआ है। फिर भी मानव द्वारा निरंतर किए जा रहे पर्यावरण विनाश कवि को सताता है। इसके परिणाम स्वरूप ‘दर्द नहीं होता’ और ‘न्याय’ नामक कविताओं के ज़रिए कवि ने अपनी पारिस्थितिक सजगता को भी उजागार किया है। 

‘डर’ नामक कविता में कवि ने समुद्र में मिलने से  अपने  अस्तित्व खोने के  संदेह में पड़ी नदी को दिखाया है।  अपने -, अपने अस्तित्व को बचाए रखने हेतु प्रयास करनेवाले लोगों को इस कविता में देखने को मिलते हैं। लेकिन  मैं  इस कविता को एक अलग दृष्टिकोण से देखना चाहती हूँ। नदी को प्रियतमा और समुद्र को प्रियतम मानकर कविता को एक बार फिर पढने से शादी करे तो अस्तित्व संकट में पड जाने की संभावना  में व्याकुल एक स्त्री को देख सकते हैं। साथ - साथ उन स्त्रियों के प्रति समाज के सदाचारियों के हस्तक्षेप को भी देख सकते हैं। 

‘लड़कियां’ नामक कविता कवि के मन में लड़कियों के प्रति जो गर्व है इसका प्रमाण है। कवि कहता है कि – लड़कियों को अपने स्वप्न  तक पहुँचने के लिए समाज को  कुछ ज़्यादा करने की ज़रूरत नहीं है। लड़कियाँ आत्मनिर्भर है। बस, बुनियादी चीजों के मिलने पर लड़कियां प्रगति हासिल कर सकती है। 

“पैर रखने भर/ थोड़ी जमीन चाहिए/ ऊपर दिखने पर/ आसमान चाहिए/ जिंदा रहने पर /साँसे चाहिए/ फिर/ नाखूनों से/ लोहे की बेड़ियों को तोड़ देगी। इरादों से जमाने बदल देंगे। हम लड़कियां हैं/”

बढ़ती आबादी, औद्योगीकरण एवं नगरीकरण के कारण कृषियोग्य क्षेत्र में निरंतर गिरावट आई है। आज किसान लगातार गरीब होता जा रहा है। किसान जो खेत में दिन – रात मेहनत करने के बावजूद भी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में  असफल है। आत्महत्या करने केलिए मजबूर किसानों की दयनीय स्थिति को ‘वह’ नामक कविता में चित्रित किया गया है। 

“वह/ न तो /पागल था / न दीवाना था / जो सूखी धरती को / अपने पसीने से चीरकर/ मौसम से जूझकर/ तूफानी हवाओं से टकराकर नियति से लड़कर/ पंचतत्वों से लड़कर/ बारिश होने की आशा रखकर ---------है!!/ गाँव का / एक /आम किसान/”

इसी तरह अनेक सामाजिक विसंगतियों की ओर अमित जी ने हमारा ध्यान खींचा है। गद्य कविता के पहले लेखक त्रिलोचन जी के अनुसार  –“मैं तुमसे बात किया करता हूँ/ और यही मेरी कविता है/” अमित जी की कविताएं प्रस्तुत  पंक्ति को सार्थक बनाने वाली है ।

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