Goddan ki viphalata: Madan soni
‘गोदान की विफलता’ मदन सोनी
मदन सोनी का आलेख ‘गोदान की विफलता’ प्रेमचंद के प्रसिद्ध उपन्यास को एक नए दृष्टिकोण से देखने का अवसर देता है। सामान्यतः ‘गोदान’ को हिंदी साहित्य की महान कृति माना जाता है, इसलिए उसकी सीमाओं पर बात करना थोड़ा असहज लग सकता है। लेकिन मेरे विचार से किसी भी साहित्यिक रचना की आलोचना करना उसकी महानता को नकारना नहीं, बल्कि उसे बेहतर ढंग से समझने का प्रयास है। इस दृष्टि से मैं मदन सोनी के विचारों से कुछ हद तक सहमत हूँ, लेकिन उनके अंतिम निष्कर्ष से पूरी तरह सहमत नहीं हूँ।
मैं इस बात से सहमत हूँ कि ‘गोदान’ में गाँव और शहर की कथाएँ उतनी स्वाभाविक रूप से जुड़ी हुई नहीं लगतीं, जितनी एक उपन्यास में अपेक्षित हो सकती हैं। होरी और धनिया का ग्रामीण जीवन उपन्यास का सबसे प्रभावशाली हिस्सा है, जबकि मेहता, मालती और खन्ना की शहरी दुनिया कई बार एक अलग कथा की तरह दिखाई देती है। इसी तरह, प्रेमचंद के गाँव में गरीबी, कर्ज, शोषण और सामाजिक बंधनों का चित्रण अधिक प्रमुख है। गाँव के उत्सवों, लोकगीतों और सामूहिक जीवन की रंगत को अपेक्षाकृत कम स्थान मिला है। इन बिंदुओं पर मदन सोनी की आलोचना विचार करने योग्य है। मुझे उनकी यह बात भी उचित लगती है कि किसी रचना को केवल इसलिए आलोचना से परे नहीं मान लेना चाहिए क्योंकि उसे साहित्य में बहुत ऊँचा स्थान प्राप्त है। साहित्य के प्रति सच्चा सम्मान तभी संभव है, जब हम उसकी खूबियों के साथ-साथ उसकी कमियों पर भी खुलकर चर्चा कर सकें।
हालाँकि, मैं ‘गोदान’ को एक विफल उपन्यास मानने से सहमत नहीं हूँ। मेरे विचार से किसी रचना की सफलता केवल उसके शिल्प या कथानक के जुड़ाव से नहीं आँकी जा सकती; यह भी देखना आवश्यक है कि वह अपने समय और समाज की सच्चाइयों को कितनी गहराई से सामने लाती है। होरी केवल एक गरीब किसान नहीं है, बल्कि वह उन लाखों किसानों का प्रतिनिधि है जो गरीबी, सामाजिक प्रतिष्ठा, धर्म और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच लगातार संघर्ष करते रहते हैं। उसकी कमजोरियाँ, मजबूरियाँ और छोटी-छोटी इच्छाएँ उसे एक वास्तविक मनुष्य बनाती हैं। धनिया का साहस, उसका स्पष्टवादी स्वभाव और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की क्षमता भी उपन्यास को विशेष मजबूती देते हैं। मुझे लगता है कि धनिया का चरित्र इस बात का उदाहरण है कि कठिन परिस्थितियों में भी एक स्त्री अपनी समझ, आत्मसम्मान और नैतिक साहस के बल पर परिवार को सँभाल सकती है।
मैं यह भी मानती हूँ कि उपन्यास की शहरी कथा को पूरी तरह अनावश्यक नहीं कहा जा सकता। गाँव और शहर अलग-अलग दुनिया दिखाई देने के बावजूद आर्थिक और सामाजिक रूप से एक-दूसरे से जुड़े हैं। जमींदारों, पूँजीपतियों और प्रभावशाली वर्गों के माध्यम से प्रेमचंद उस व्यवस्था की ओर संकेत करते हैं, जिसमें किसान का शोषण केवल गाँव तक सीमित नहीं रहता। इसलिए शहरी कथा में कुछ ढीलापन होने के बावजूद उसका व्यापक सामाजिक महत्त्व है। यह भी संभव है कि प्रेमचंद का उद्देश्य केवल होरी की व्यक्तिगत त्रासदी दिखाना नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था को सामने लाना रहा हो, जो ऐसे जीवन के लिए जिम्मेदार है।
एक reader के रूप में मुझे ‘गोदान’ का स्त्री-पक्ष भी विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण लगता है। धनिया, झुनिया और मालती जैसी स्त्रियाँ अपने-अपने सामाजिक परिवेश में अलग-अलग तरह के संघर्ष करती हैं। धनिया ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों और सामाजिक रूढ़ियों से जूझती है, झुनिया को समाज के तिरस्कार का सामना करना पड़ता है और मालती के माध्यम से शहरी स्त्री के स्वतंत्र व्यक्तित्व का एक अलग रूप सामने आता है। इन स्त्री-पात्रों को एक साथ देखने पर स्पष्ट होता है कि प्रेमचंद का उपन्यास केवल किसान की आर्थिक बदहाली की कहानी नहीं है, बल्कि इसमें स्त्रियों की स्थिति, सामाजिक नैतिकता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे प्रश्न भी शामिल हैं। हालाँकि, इन पात्रों के बीच संबंधों और उनकी कथाओं को और अधिक गहराई से विकसित किया जा सकता था, फिर भी उनका महत्त्व कम नहीं हो जाता।
अंततः, मुझे मदन सोनी का आलेख इसलिए महत्त्वपूर्ण लगता है क्योंकि वह ‘गोदान’ को नए सिरे से पढ़ने और उसके बारे में अपनी स्वतंत्र राय बनाने के लिए प्रेरित करता है। उनकी आलोचना के कई बिंदुओं से सहमत होते हुए भी मैं ‘गोदान’ को विफल कृति नहीं मान सकती। मेरे विचार से उसकी महानता किसी दोषरहित शिल्प में नहीं, बल्कि होरी और धनिया जैसे पात्रों के माध्यम से सामने आने वाले मानवीय दुख, सामाजिक अन्याय और किसान जीवन की सच्चाई में है। कोई रचना महान होने के साथ-साथ कुछ सीमाएँ भी रख सकती है। इसलिए ‘गोदान’ की कमियों को स्वीकार करना उचित है, लेकिन केवल उन्हीं के आधार पर उसकी साहित्यिक उपलब्धि को नकार देना मुझे न्यायसंगत नहीं लगता। मेरे लिए इस आलेख का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष यही है कि यह किसी स्थापित साहित्यिक मान्यता को आँख बंद करके स्वीकार करने के बजाय स्वयं सोचने, प्रश्न करने और अपना निष्कर्ष निकालने की प्रेरणा देता है।
मदन सोनी का आलेख ‘गोदान की विफलता’ प्रेमचंद के प्रसिद्ध उपन्यास को एक नए दृष्टिकोण से देखने का अवसर देता है। सामान्यतः ‘गोदान’ को हिंदी साहित्य की महान कृति माना जाता है, इसलिए उसकी सीमाओं पर बात करना थोड़ा असहज लग सकता है। लेकिन मेरे विचार से किसी भी साहित्यिक रचना की आलोचना करना उसकी महानता को नकारना नहीं, बल्कि उसे बेहतर ढंग से समझने का प्रयास है। इस दृष्टि से मैं मदन सोनी के विचारों से कुछ हद तक सहमत हूँ, लेकिन उनके अंतिम निष्कर्ष से पूरी तरह सहमत नहीं हूँ।
मैं इस बात से सहमत हूँ कि ‘गोदान’ में गाँव और शहर की कथाएँ उतनी स्वाभाविक रूप से जुड़ी हुई नहीं लगतीं, जितनी एक उपन्यास में अपेक्षित हो सकती हैं। होरी और धनिया का ग्रामीण जीवन उपन्यास का सबसे प्रभावशाली हिस्सा है, जबकि मेहता, मालती और खन्ना की शहरी दुनिया कई बार एक अलग कथा की तरह दिखाई देती है। इसी तरह, प्रेमचंद के गाँव में गरीबी, कर्ज, शोषण और सामाजिक बंधनों का चित्रण अधिक प्रमुख है। गाँव के उत्सवों, लोकगीतों और सामूहिक जीवन की रंगत को अपेक्षाकृत कम स्थान मिला है। इन बिंदुओं पर मदन सोनी की आलोचना विचार करने योग्य है। मुझे उनकी यह बात भी उचित लगती है कि किसी रचना को केवल इसलिए आलोचना से परे नहीं मान लेना चाहिए क्योंकि उसे साहित्य में बहुत ऊँचा स्थान प्राप्त है। साहित्य के प्रति सच्चा सम्मान तभी संभव है, जब हम उसकी खूबियों के साथ-साथ उसकी कमियों पर भी खुलकर चर्चा कर सकें।
हालाँकि, मैं ‘गोदान’ को एक विफल उपन्यास मानने से सहमत नहीं हूँ। मेरे विचार से किसी रचना की सफलता केवल उसके शिल्प या कथानक के जुड़ाव से नहीं आँकी जा सकती; यह भी देखना आवश्यक है कि वह अपने समय और समाज की सच्चाइयों को कितनी गहराई से सामने लाती है। होरी केवल एक गरीब किसान नहीं है, बल्कि वह उन लाखों किसानों का प्रतिनिधि है जो गरीबी, सामाजिक प्रतिष्ठा, धर्म और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच लगातार संघर्ष करते रहते हैं। उसकी कमजोरियाँ, मजबूरियाँ और छोटी-छोटी इच्छाएँ उसे एक वास्तविक मनुष्य बनाती हैं। धनिया का साहस, उसका स्पष्टवादी स्वभाव और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की क्षमता भी उपन्यास को विशेष मजबूती देते हैं। मुझे लगता है कि धनिया का चरित्र इस बात का उदाहरण है कि कठिन परिस्थितियों में भी एक स्त्री अपनी समझ, आत्मसम्मान और नैतिक साहस के बल पर परिवार को सँभाल सकती है।
मैं यह भी मानती हूँ कि उपन्यास की शहरी कथा को पूरी तरह अनावश्यक नहीं कहा जा सकता। गाँव और शहर अलग-अलग दुनिया दिखाई देने के बावजूद आर्थिक और सामाजिक रूप से एक-दूसरे से जुड़े हैं। जमींदारों, पूँजीपतियों और प्रभावशाली वर्गों के माध्यम से प्रेमचंद उस व्यवस्था की ओर संकेत करते हैं, जिसमें किसान का शोषण केवल गाँव तक सीमित नहीं रहता। इसलिए शहरी कथा में कुछ ढीलापन होने के बावजूद उसका व्यापक सामाजिक महत्त्व है। यह भी संभव है कि प्रेमचंद का उद्देश्य केवल होरी की व्यक्तिगत त्रासदी दिखाना नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था को सामने लाना रहा हो, जो ऐसे जीवन के लिए जिम्मेदार है।
एक reader के रूप में मुझे ‘गोदान’ का स्त्री-पक्ष भी विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण लगता है। धनिया, झुनिया और मालती जैसी स्त्रियाँ अपने-अपने सामाजिक परिवेश में अलग-अलग तरह के संघर्ष करती हैं। धनिया ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों और सामाजिक रूढ़ियों से जूझती है, झुनिया को समाज के तिरस्कार का सामना करना पड़ता है और मालती के माध्यम से शहरी स्त्री के स्वतंत्र व्यक्तित्व का एक अलग रूप सामने आता है। इन स्त्री-पात्रों को एक साथ देखने पर स्पष्ट होता है कि प्रेमचंद का उपन्यास केवल किसान की आर्थिक बदहाली की कहानी नहीं है, बल्कि इसमें स्त्रियों की स्थिति, सामाजिक नैतिकता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे प्रश्न भी शामिल हैं। हालाँकि, इन पात्रों के बीच संबंधों और उनकी कथाओं को और अधिक गहराई से विकसित किया जा सकता था, फिर भी उनका महत्त्व कम नहीं हो जाता।
अंततः, मुझे मदन सोनी का आलेख इसलिए महत्त्वपूर्ण लगता है क्योंकि वह ‘गोदान’ को नए सिरे से पढ़ने और उसके बारे में अपनी स्वतंत्र राय बनाने के लिए प्रेरित करता है। उनकी आलोचना के कई बिंदुओं से सहमत होते हुए भी मैं ‘गोदान’ को विफल कृति नहीं मान सकती। मेरे विचार से उसकी महानता किसी दोषरहित शिल्प में नहीं, बल्कि होरी और धनिया जैसे पात्रों के माध्यम से सामने आने वाले मानवीय दुख, सामाजिक अन्याय और किसान जीवन की सच्चाई में है। कोई रचना महान होने के साथ-साथ कुछ सीमाएँ भी रख सकती है। इसलिए ‘गोदान’ की कमियों को स्वीकार करना उचित है, लेकिन केवल उन्हीं के आधार पर उसकी साहित्यिक उपलब्धि को नकार देना मुझे न्यायसंगत नहीं लगता। मेरे लिए इस आलेख का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष यही है कि यह किसी स्थापित साहित्यिक मान्यता को आँख बंद करके स्वीकार करने के बजाय स्वयं सोचने, प्रश्न करने और अपना निष्कर्ष निकालने की प्रेरणा देता है।
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