Moonamidangal written by K V Manikandan
“भारत संस्कृति को सदा थामे खड़े रहने वाले यहाँ पढ़ना बंद करें। यह पुस्तक आपके लिए नहीं है। महाभारत, गद्य पढ़ें, उसमें सभी भाव मिलेंगे। जब वह पूरा हो जाएगा, तब आप सदा के लिए थामे खड़े नहीं रह पाएँगे। तब आप यह पुस्तक पढ़ सकते हैं।” – इस टिप्पणी के साथ ही उपन्यास की शुरुआत होती है। साथ ही लेखक यह भी स्पष्ट करता है कि इसमें दिए गए पात्र काल्पनिक नहीं हैं। वे सभी आज जीवित या मृत व्यक्ति हैं। पात्रों के नाम, स्थान, काल आदि में यदि कोई जोड़–तोड़ या परिवर्तन किया गया हो तो उसकी स्पष्ट जानकारी मैंने दर्ज की है।
यह उपन्यास स्त्री–पुरुष संबंधों के अनुभवों के माध्यम से आगे बढ़ता है। इंदिरा, डालिया, अहल्या, नरेंद्रन आदि इसके प्रमुख पात्र हैं। इंदिरा, जिसने विवाह किए बिना ही अपने भाई के बच्चे को जन्म दिया, लेखिका और माँ बनी है। चित्रकार नरेंद्रन को भानुमति दीदी के कान की बाली की खुशबू सदा भाती रही, जिस दिन से उसने पुरुषत्व का प्रकाश देखा। पिता से झगड़कर वह गाँव छोड़ देता है और पंद्रह वर्षों बाद लौटता है। औरतों के शरीर को वह तीसरे स्थानों के रूप में देखता है।
एक दिन अचानक लौटने के बाद से उसकी छोटी बहन इंदिरा उसके साथ रहती है। वह मांसाहार नहीं खाती, उसके शरीर से हमेशा रामचम का गंध निकलता है। उसके साथ उसकी प्रिय सहेली डालिया भी होती है। नरेंद्रन अक्सर मौन रहता है। उसने ही इंदिरा से कहा था कि हजार चित्रों को देखते–देखते कोई व्यक्ति मौन में उतर जाता है। इंदिरा की कभी की गई श्रद्धा धीरे–धीरे प्रेम में बदल जाती है, किंतु सामाजिक बंधनों में बंधी वह रोती है। नरेंद्रन का विवाह उसके लिए एक आघात था। किंतु अहल्या के आने के बाद वही जीवन और भी सुंदर लगता है।
नरेंद्रन और अहल्या के बच्चे की किराए की कोख बन जाने वाली इंदिरा के दुख–सुख और व्यथाएँ सबसे अधिक उसकी मित्र डालिया ही समझती है। वह इंदिरा के साथ रहती है, उसकी सब कुछ। उनके संबंध को लेखक कोई नाम नहीं देना चाहता।
इंदिरा अपने जादूगर से पूछती है – “एक बहन अपने भाई से प्रेम क्यों नहीं कर सकती?” उसे समझ आता है कि समाज रिश्तों के बीच ऐसे ही खेल खेलता है। यहाँ तक कि नरेंद्रन की पत्नी अहल्या भी उसके प्रेम की तीव्रता को समझती है। उपन्यास में कई जगहों पर अलग–अलग पात्रों के बीच काम–स्पर्श दिखाई देता है, लेकिन इंदिरा और नरेंद्रन के बीच लेखक जानबूझकर ऐसा कुछ नहीं लाता। इंदिरा का कार्य केवल बिना रति–संबंध के माँ बन जाना ही था।
सभी स्त्री पात्र पुरुषों की तुलना में अधिक व्यवहारिक और शक्तिशाली दिखाए गए हैं। सुंदर चीफ़ एडिटर के बिस्तर पर आने के निमंत्रण को ठुकराने के बाद, अहल्या बदला लेने के लिए ऑफिस के गार्ड के कमरे में चली जाती है। अपने सीने पर “I am not virgin” लिखने का साहस भी वह दिखाती है। किंतु उसके भीतर छुपा हुआ मसोचिज़्म जब उजागर होता है, तो पढ़ने वाला सिहर उठता है।
नरेंद्रन और अहल्या के बच्चे को जन्म देने के लिए विवश इंदिरा की पीड़ा पाठकों को छू जाती है। वह उनके जुड़वा बच्चों को जन्म देती है, जिनमें से एक बच्चा उसे ही पालने के लिए दिया जाता है। उपन्यास के अंत में लेखक परजीवियों के सामने उसके बच्चे के पिता को लाकर खड़ा करता है।
के. वी. मणिकंडन की भाषा पाठकों को आकर्षित करती है। यह उपन्यास सदाचारी समाज के सिर पर जबरदस्त प्रहार करने वाले शब्दों से भरा है। यह मानव मन की गहराई और छिपे रहस्यों में उतरने की एक झलक है।
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