Satyaki: Dwapar Ka Ajey Yodha

 महाभारत भारतीय साहित्य और संस्कृति की वह महागाथा है जिसे शाश्वत कहा जाता है। इसमें धर्म, राजनीति, युद्ध और दर्शन का ऐसा मिश्रण है जो आज भी हमें विस्मित करता है। लेकिन जब हम इस महाकाव्य का स्मरण करते हैं तो सबसे पहले अर्जुन, भीम, दुर्योधन, भीष्म या कृष्ण जैसे पात्र ही सामने आते हैं। ऐसे में कई अन्य योद्धा और चरित्र पीछे छूट जाते हैं। सात्यकि ऐसा ही एक नाम है—कृष्ण का शिष्य, यदुवंशी योद्धा और कुरुक्षेत्र युद्ध का महत्त्वपूर्ण लेकिन प्रायः भुला दिया गया सेनानी। इसी अनदेखे नायक पर केंद्रित हाल का हिंदी उपन्यास सात्यकि द्वापर का अजेय योद्धा पाठकों को न केवल नया दृष्टिकोण देता है, बल्कि यह भी बताता है कि साहित्य कैसे हमारी ऐतिहासिक स्मृति को नया आकार दे सकता है।

इस उपन्यास की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि लेखक ने सात्यकि को केवल युद्ध-भूमि का योद्धा बनाकर नहीं छोड़ा, बल्कि उसकी मानवीय संवेदनाओं और मानसिक संघर्षों को भी सामने रखा है। कृष्ण का शिष्य होना उसे गौरव तो देता है, लेकिन इसके साथ ही उस पर नैतिक दायित्व का बोझ भी है। युद्धभूमि में उसकी भूमिका केवल एक योद्धा की नहीं, बल्कि एक रणनीतिकार और वफादार साथी की भी है। कथा में ऐसे प्रसंग हैं जहाँ सात्यकि को यह चुनना पड़ता है कि उसका व्यक्तिगत स्वार्थ कहाँ है और उसका धर्म उसे किस ओर ले जाता है। यह द्वंद्व उपन्यास को और गहन बना देता है।

लेखक ने उपन्यास को गढ़ते समय महाभारत की कथा से जुड़ाव बनाए रखा है, लेकिन साथ ही नए संवाद और स्थितियाँ भी निर्मित की हैं। इससे पाठक को यह आभास होता है कि वह एक परिचित कथा को नए ढंग से देख रहा है। उदाहरण के लिए, अर्जुन और सात्यकि के संबंध या कृष्ण और सात्यकि की गुरु-शिष्य परंपरा को जिस आत्मीयता से प्रस्तुत किया गया है, वह पाठक के भीतर भावनात्मक स्पर्श उत्पन्न करती है।

भाषा का चयन यहाँ विशेष उल्लेखनीय है। लेखक ने कठिन संस्कृतनिष्ठ शब्दों के बजाय सहज हिंदी का प्रयोग किया है, ताकि उपन्यास व्यापक पाठकवर्ग तक पहुँचे। युद्ध के दृश्य सिनेमाई अंदाज में हैं—धरती का काँपना, रथों की टक्कर, शंखध्वनि और तलवारों की टंकार जैसे वर्णन पाठक को सीधे उस वातावरण में खींच ले जाते हैं। वहीं सात्यकि के अंतर्मन की झलक देने वाले अंश शांत, धीमे और आत्मचिंतनशील हैं। यह विरोधाभास कथा को जीवंत बना देता है। हालांकि, कहीं-कहीं पर युद्ध प्रसंग इतने विस्तार में चले जाते हैं कि गति थोड़ी धीमी हो जाती है, और पाठक को अगले मोड़ तक पहुँचने में अधिक समय लगता है।

उपन्यास की एक प्रमुख ताकत इसका ‘पुनर्पाठ’ है। यह केवल कहानी नहीं सुनाता, बल्कि यह भी दिखाता है कि हमारी स्मृति चयनात्मक क्यों होती है। सात्यकि, जिसने युद्ध में निर्णायक भूमिका निभाई, उसे हमारी लोककथाओं और लोकप्रिय कथानकों में शायद ही जगह क्यों मिली? क्या यह इतिहास की राजनीति है या कथावाचकों की प्राथमिकता? यह प्रश्न उपन्यास को महज मनोरंजन से आगे ले जाकर बौद्धिक विमर्श का हिस्सा बनाते हैं।

कमजोरियों की बात करें तो कहीं-कहीं लेखक भावनात्मक उभार में अतिशयोक्ति कर बैठते हैं। सात्यकि को लगभग अति-मानवीय रूप में चित्रित करने से उसकी मानवीय कमजोरी और सीमाएँ धुंधली हो जाती हैं। इसके अलावा, ऐतिहासिक तथ्यों और कल्पना के बीच संतुलन हमेशा स्पष्ट नहीं रहता—कभी लगता है कि लेखक महाभारत की परंपरागत कथा से चिपके रहना चाहते हैं, तो कभी वे पूरी तरह कल्पनाशील हो जाते हैं। यह असमानता कुछ पाठकों को खटक सकती है।

फिर भी, कुल मिलाकर सात्यकि द्वापर का अजेय योद्धाहिंदी साहित्य में एक महत्त्वपूर्ण जोड़ है। यह हमें यह याद दिलाता है कि इतिहास केवल विजेताओं की गाथा नहीं होता, बल्कि उसमें उन पात्रों की भी आवाज होती है जो अक्सर छिपा दिए जाते हैं। इस उपन्यास को पढ़ते समय पाठक न केवल महाभारत को नए ढंग से देखता है, बल्कि यह भी समझता है कि साहित्य किस प्रकार हाशिए पर पड़े नायकों को केंद्र में ला सकता है। यह उपन्यास उन सभी के लिए उपयोगी है जो महाभारत की बहुआयामी गाथा को सिर्फ विजय और पराजय की दृष्टि से नहीं, बल्कि मानवीय जटिलताओं और भूले-बिसरे दृष्टिकोणों के माध्यम से समझना चाहते हैं।

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