Crowd vs Society
हम भीड़ बन रहे हैं या समाज? सामूहिक शोर में खोती मनुष्यता
आज के डिजिटल युग में हम एक अजीब विरोधाभास में जी रहे हैं। तकनीक ने हमें पूरी दुनिया के करीब तो ला दिया है, लेकिन क्या हम वाकई एक-दूसरे से जुड़े हैं?
हाल ही में साहित्य और समाज के गहरे अंतर्संबंधों को पढ़ते हुए कुछ कड़वी मगर जरूरी सच्चाइयों से रूबरू होने का मौका मिला:
हम भीड़ बन रहे हैं या समाज? सामूहिक शोर में खोती मनुष्यता
आज के डिजिटल युग में हम एक अजीब विरोधाभास में जी रहे हैं। तकनीक ने हमें पूरी दुनिया के करीब तो ला दिया है, लेकिन क्या हम वाकई एक-दूसरे से जुड़े हैं?
हाल ही में साहित्य और समाज के गहरे अंतर्संबंधों को पढ़ते हुए कुछ कड़वी मगर जरूरी सच्चाइयों से रूबरू होने का मौका मिला:
Crowd vs. Society
राजनीति और बाजार हमें 'भीड़' में बदलना चाहते हैं। क्यों? क्योंकि भीड़ सवाल नहीं पूछती, वह सिर्फ शोर मचाती है या प्रतिक्रिया (React) देती है। लेकिन एक स्वस्थ 'समाज' वह है जहाँ हर व्यक्ति की अपनी स्वतंत्र सोच और संवेदनशीलता हो। आज हम सोशल मीडिया पर एक 'डिजिटल भीड़' बनते जा रहे हैं।
हमें हर सेकंड सूचनाएँ मिल रही हैं, लेकिन 'अनुभूति' (Feeling) गायब है। हम किसी त्रासदी की खबर पढ़ते हैं, एक 'Sad' इमोजी भेजते हैं और अगले ही सेकंड एक कॉमेडी रील देखने लगते हैं। सूचनाओं के इस अंबार ने हमें इतना सुन्न कर दिया है कि किसी भी बात को गहराई से महसूस करने का समय ही नहीं बचा।
अक्सर लोग पूछते हैं कि आज के दौर में किताबों और साहित्य की क्या जरूरत है? जवाब यह है कि- जब राजनीति हमें 'वोट बैंक' और तकनीक हमें 'डेटा' समझती है, तब केवल साहित्य और कला ही हमें 'मनुष्य' मानती है। साहित्य का काम भीड़ में खोए व्यक्ति को वापस उसकी पहचान और उसके संस्कार याद दिलाना है।आज गुलामी की बेड़ियाँ दिखाई नहीं देतीं। हम अपने ही समाज में दो दुनिया बना चुके हैं-एक वह जो चमक-धमक वाले 'सुरक्षा जाल' में कैद है और दूसरी वह जो हाशिये पर है। हम शारीरिक रूप से साथ होकर भी मानसिक रूप से मीलों दूर हैं।
भविष्य का संकट परमाणु बम से बड़ा संवेदनशीलता का खत्म होना है। तकनीक का उपयोग कीजिए, पर उसे अपनी संवेदनाओं को निगलने मत दीजिए। भीड़ का हिस्सा मत बनिए, 'मनुष्य' बने रहिए।
राजनीति और बाजार हमें 'भीड़' में बदलना चाहते हैं। क्यों? क्योंकि भीड़ सवाल नहीं पूछती, वह सिर्फ शोर मचाती है या प्रतिक्रिया (React) देती है। लेकिन एक स्वस्थ 'समाज' वह है जहाँ हर व्यक्ति की अपनी स्वतंत्र सोच और संवेदनशीलता हो। आज हम सोशल मीडिया पर एक 'डिजिटल भीड़' बनते जा रहे हैं।
हमें हर सेकंड सूचनाएँ मिल रही हैं, लेकिन 'अनुभूति' (Feeling) गायब है। हम किसी त्रासदी की खबर पढ़ते हैं, एक 'Sad' इमोजी भेजते हैं और अगले ही सेकंड एक कॉमेडी रील देखने लगते हैं। सूचनाओं के इस अंबार ने हमें इतना सुन्न कर दिया है कि किसी भी बात को गहराई से महसूस करने का समय ही नहीं बचा।
अक्सर लोग पूछते हैं कि आज के दौर में किताबों और साहित्य की क्या जरूरत है? जवाब यह है कि- जब राजनीति हमें 'वोट बैंक' और तकनीक हमें 'डेटा' समझती है, तब केवल साहित्य और कला ही हमें 'मनुष्य' मानती है। साहित्य का काम भीड़ में खोए व्यक्ति को वापस उसकी पहचान और उसके संस्कार याद दिलाना है।आज गुलामी की बेड़ियाँ दिखाई नहीं देतीं। हम अपने ही समाज में दो दुनिया बना चुके हैं-एक वह जो चमक-धमक वाले 'सुरक्षा जाल' में कैद है और दूसरी वह जो हाशिये पर है। हम शारीरिक रूप से साथ होकर भी मानसिक रूप से मीलों दूर हैं।
भविष्य का संकट परमाणु बम से बड़ा संवेदनशीलता का खत्म होना है। तकनीक का उपयोग कीजिए, पर उसे अपनी संवेदनाओं को निगलने मत दीजिए। भीड़ का हिस्सा मत बनिए, 'मनुष्य' बने रहिए।
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