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Rossum‘s Universal Robots

  कारेल चापेक का नाटक आर.यू.आर. (Rossum’s Universal Robots) आधुनिक विज्ञान-कथा साहित्य के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जाता है। 1920 में प्रकाशित और 1921 में मंचित इस नाटक की सबसे बड़ी देन “रोबोट” शब्द का पहली बार प्रयोग है, जिसने साहित्य, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विमर्श को नई दिशा प्रदान की। यह कृति केवल वैज्ञानिक कल्पना तक सीमित नहीं है, बल्कि मानवीय सभ्यता के भविष्य के प्रति एक गहन चेतावनी भी प्रस्तुत करती है। नाटक का कथानक एक ऐसी फैक्ट्री के इर्द-गिर्द केंद्रित है, जहाँ कृत्रिम मानव-जैसे प्राणी—“रोबोट”—बनाए जाते हैं। इनका मूल उद्देश्य श्रम को सरल बनाना और उत्पादन को अधिकतम करना है। प्रारंभ में मनुष्य इन्हें मात्र यांत्रिक उपकरण समझकर उपयोग करता है, किंतु समय के साथ ये रोबोट आत्मचेतना विकसित करने लगते हैं और अपने अस्तित्व से संबंधित प्रश्न उठाते हैं। अंततः वे विद्रोह कर मनुष्यों पर अधिकार स्थापित कर लेते हैं। चापेक इस कथा के माध्यम से स्पष्ट करते हैं कि यदि तकनीक को केवल लाभ और पूँजी के दृष्टिकोण से देखा जाएगा, तो वही तकनीक अंततः मानवता के लिए संकट का कारण बन स...

Satyaki: Dwapar Ka Ajey Yodha

  महाभारत भारतीय साहित्य और संस्कृति की वह महागाथा है जिसे शाश्वत कहा जाता है। इसमें धर्म, राजनीति, युद्ध और दर्शन का ऐसा मिश्रण है जो आज भी हमें विस्मित करता है। लेकिन जब हम इस महाकाव्य का स्मरण करते हैं तो सबसे पहले अर्जुन, भीम, दुर्योधन, भीष्म या कृष्ण जैसे पात्र ही सामने आते हैं। ऐसे में कई अन्य योद्धा और चरित्र पीछे छूट जाते हैं। सात्यकि ऐसा ही एक नाम है—कृष्ण का शिष्य, यदुवंशी योद्धा और कुरुक्षेत्र युद्ध का महत्त्वपूर्ण लेकिन प्रायः भुला दिया गया सेनानी। इसी अनदेखे नायक पर केंद्रित हाल का हिंदी उपन्यास  “ सात्यकि   द्वापर   का   अजेय   योद्धा ”  पाठकों को न केवल नया दृष्टिकोण देता है, बल्कि यह भी बताता है कि साहित्य कैसे हमारी ऐतिहासिक स्मृति को नया आकार दे सकता है। इस उपन्यास की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि लेखक ने सात्यकि को केवल युद्ध-भूमि का योद्धा बनाकर नहीं छोड़ा, बल्कि उसकी मानवीय संवेदनाओं और मानसिक संघर्षों को भी सामने रखा है। कृष्ण का शिष्य होना उसे गौरव तो देता है, लेकिन इसके साथ ही उस पर नैतिक दायित्व का बोझ भी है। युद्धभूमि में उसकी भू...

Moonamidangal written by K V Manikandan

“भारत संस्कृति को सदा थामे खड़े रहने वाले यहाँ पढ़ना बंद करें। यह पुस्तक आपके लिए नहीं है। महाभारत, गद्य पढ़ें, उसमें सभी भाव मिलेंगे। जब वह पूरा हो जाएगा, तब आप सदा के लिए थामे खड़े नहीं रह पाएँगे। तब आप यह पुस्तक पढ़ सकते हैं।” – इस टिप्पणी के साथ ही उपन्यास की शुरुआत होती है। साथ ही लेखक यह भी स्पष्ट करता है कि इसमें दिए गए पात्र काल्पनिक नहीं हैं। वे सभी आज जीवित या मृत व्यक्ति हैं। पात्रों के नाम, स्थान, काल आदि में यदि कोई जोड़–तोड़ या परिवर्तन किया गया हो तो उसकी स्पष्ट जानकारी मैंने दर्ज की है। यह उपन्यास स्त्री–पुरुष संबंधों के अनुभवों के माध्यम से आगे बढ़ता है। इंदिरा, डालिया, अहल्या, नरेंद्रन आदि इसके प्रमुख पात्र हैं। इंदिरा, जिसने विवाह किए बिना ही अपने भाई के बच्चे को जन्म दिया, लेखिका और माँ बनी है। चित्रकार नरेंद्रन को भानुमति दीदी के कान की बाली की खुशबू सदा भाती रही, जिस दिन से उसने पुरुषत्व का प्रकाश देखा। पिता से झगड़कर वह गाँव छोड़ देता है और पंद्रह वर्षों बाद लौटता है। औरतों के शरीर को वह तीसरे स्थानों के रूप में देखता है। एक दिन अचानक लौटने के बाद से उसकी छ...